उपवास का वैज्ञानिक महत्व

उपवास का वैज्ञानिक महत्व

वैद्यानां शारदी माता पिता च कुसुमाकरः ।।

अर्थात्- चिकित्सकों के लिए शरद ऋतु माता के समान और वसंत ऋतु पिता के समान लाभकारी है। दोनों ऋतुएँ मानव के स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं। इन दोनों ऋतुओं के आगमन पर अधिकांश लोग बुखार, खाँसी, ज़ुकाम, मलेरिया, पीलिया, टायफायड, मूत्ररोग, आदि से पीडित हो जाते हैं। इन दोनों ऋतुओं के आगमन पर ऋतु  परिवर्तन और दो ऋतुओं की संधि होने से रोगों को अधिक बल मिलता है। इनसे बचने का आसान सा घरेलू उपाय है – धार्मिक व्रतों का पालन करना, ईश्वर की आराधना करना, खान- पान से संबंधित  नियमों का पालन करना और ऋतु के अनुसार फलों और भोजन का सेवन करना ।

उपवास का सही उद्देश्य है – उप (समीप) + वास (रहना), अर्थात् – ईश्वर या अध्यात्म से निकटता। इसलिए व्रत में सात्विक भोजन का विशेष महत्व है। व्रत के समय बढ़ा हुआ पित्त बहुत से गंभीर रोगों और कैंसर कोशिकाओं का नाश करता है। जापान के वैज्ञानिक श्री योशीनोरी ओसुमी ने यह सिद्ध किया था कि कैसे उपवास के समय शरीर की कोशिकाएं अपना पुनरावर्तन (recycle) और नवीकरण (repair) करती हैं। Autophagy नाम की एक स्वाभाविक शारीरक क्रिया है, जिसमें शरीर की रोगी कोशिकाएँ स्वयं को कैसे नष्ट कर देती हैं और यदि इस स्वाभाविक क्रिया का किसी भी कारण से उत्परिवर्तन (mutation) या ह्रास होता है, तब कोशिकाओं में परिवर्तन के कारण कैंसर, डायबिटीज़, आदि गंभीर रोग होते हैं। इस बात का वैज्ञानिक तथ्य श्री योशीनोरी ओसुमी ने प्रमाणित किया। उनको अपनी खोज के लिए वर्ष 2016 में  Nobel prize in Physiology or Medicine (Fasting for Health & Longevity) से सम्मानित किया गया।

सप्ताह में कम से कम एक दिन उपवास अवश्य रखना चाहिए। यदि संभव हो, तो उपवास निराहार रखें। निराहार उपवास के लिए तय शास्त्रोक्त मानक यह है कि उपवास से एक सप्ताह पहले से भोजन धीरे-धीरे कम करके छोड़ना चाहिए और उपवास के दिन पूरी तरह से निराहार रहकर अगले दिन हल्का भोजन कम मात्रा में एक ही समय खाना चाहिए। फिर धीरे-धीरे बढाकर एक सप्ताह में  पुनर्स्थिति में आना चाहिए। ऐसा ही क्रम निर्जल व्रत का भी कहा गया है।  सही मायने में निर्जल और निराहार व्रत का क्रम 15 दिन (7 दिन पहले +7 दिन बाद) का कहा गया है। आधुनिक जीवन में हम अचानक व्रत के दिन (एकादशी, करवाचौथ, संकटचौथ, आदि) सब कुछ खाना छोड़ देते हैं। इससे पाचनतंत्र को विशेष हानि पहुँचती है। उपवास के खुलने पर छक कर भारी करने से विशेष रूप से वात,आदि दोषों का प्रकोप होता है और पाचनतंत्र के अंगों को बहुत नुकसान होता है।

यदि निराहार व्रत संभव न हो, तो व्रत के समय भोजन  (फलाहार) एक बार करें। जिन लोगों को अधिक भूख लगती है, वे शास्त्रों के अनुसार दो बार फलाहार कर सकते हैं। अधिक बार मुँह झूठा नहीं करना चाहिए। भोजन सूर्यास्त से पहले कर लेना चाहिए।

भोजन हल्का, सुपाच्य, सात्विक और बिना लाल मिर्ची, अमचूर का होना चाहिए।

शिकंजी, फलों का ताज़ा रस, नारियल पानी, ठंडाई, तक्र और जल का बार-बार सेवन ऋतु व काल के अनुसार अवश्य करें। इससे पेट व आँतों में आया हुआ पित्त सरलता से पेशाब व मल के द्वारा बाहर निकल जाता है।

गर्भिणी, छोटा बच्चा, अतिवृद्ध और जिनको उपवास में आस्था न हो, इन लोगों को उपवास नहीं रखना चाहिए।

वे रोगी जो डायबिटीज़, पेट अथवा आँत में अल्सर के रोगी, अम्लपित्त, जिनका बीपी या शुगर लो हो जाता हो, हाइपर -थायरायड के रोगी, अति गंभीर रोग जैसे कैंसर, टीबी, क्षयरोग, सारकॉयड, अल्सरेटिव कोलायटिस, क्रौंस डिज़ीज़, आदि से पीडित हैं, उनको बिना कुशल वैद्यकीय परामर्श के उपवास नहीं करना चाहिए तथा वैद्यकीय सलाह से अपने लिए उचित आहार और दवाई के नियम के विषय में जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

गलत/ अवैज्ञानिक तरीके से रखा गया उपवास शरीर को फायदे की जगह नुकसान ही पहुंचाता है।

इक्षुरापः पयोमूलं ताम्बूलं फलमौषधम्।

भक्षयित्वापि कर्त्तव्याः स्नानदानादिकाः क्रियाः।।

अर्थात्- गन्ना (गन्ने से निर्मित वस्तुएँ), जल, मूल (ज़मीन के नीचे वाले – root tubers जैसे- शक्करकंद, आलू, चुकंदर), पान फल, औषध आदि – इन वस्तुओं को खाने के बाद भी स्नान, दान, आदि क्रियाएँ करनी ही चाहिए।

नोट- इनमें अन्न नहीं कहा गया है। ये वस्तुएँ व्रत के दिन खाकर स्नान, दान, आदि दैनिक क्रियाएँ करने से दोष नहीं होता है।

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